भगवान श्री कृष्ण का नाम आते ही हमारे मन में उनकी मोहक छवि उभरती है—गले में वनमाला, हाथ में बांसुरी और सिर पर मोर पंख सुशोभित। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्री कृष्ण अपने मुकुट में मोर पंख क्यों धारण करते हैं? इसके पीछे एक बहुत ही सुंदर कथा है, जिसे आज हम जानेंगे।

मोर की भक्ति और कृष्ण की उपेक्षा
यह घटना भगवान श्री कृष्ण के बाल्यकाल की है, जब वे गोकुल में बाल लीलाओं से सभी को आनंदित कर रहे थे। गोकुल में एक मोर रहता था, जो बहुत ही चतुर और श्री कृष्ण का परम भक्त था। वह श्री कृष्ण की कृपा पाना चाहता था, इसलिए उसने एक युक्ति सोची।
मोर श्री कृष्ण के द्वार पर जाकर बैठ गया और जब भी वे अंदर-बाहर आते, वह भावपूर्ण भजन गाता:
🦚 "मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे गोपाल, सांवरिया मेरे गोपाल, सांवरिया मेरे..."
एक दिन बीता, दो दिन बीते, फिर तीन-चार दिन और देखते ही देखते पूरा एक वर्ष बीत गया, लेकिन श्री कृष्ण ने उसकी एक न सुनी। मोर निराश होकर रोने लगा।
मैना की सलाह और राधा रानी की दया
उसी समय, एक मैना उड़ती हुई वहां से गुजर रही थी। उसने मोर को रोते देखा और यह जानकर हैरान रह गई कि भगवान कृष्ण के द्वार पर कोई रो रहा है!
मैना ने मोर से पूछा, "मोर भाई, तुम क्यों रो रहे हो?"
मोर ने उत्तर दिया, "मैं पिछले एक वर्ष से श्री कृष्ण के द्वार पर भजन गा रहा हूं, लेकिन उन्होंने मेरी ओर देखा तक नहीं।"
मैना बोली, "मैं राधा रानी के बरसाने से आई हूं। तुम मेरे साथ वहां चलो, वे बहुत दयालु हैं और अवश्य ही तुम पर कृपा करेंगी।"
मोर को यह सुझाव पसंद आया और वह मैना के साथ बरसाने चला गया।
राधा के प्रेम से मोर का उद्धार
बरसाने पहुंचकर मैना ने गाना शुरू किया:
"श्री राधे राधे राधे, बरसाने वाली राधे..."
लेकिन मोर अब भी अपने पुराने भजन पर अडिग रहा:
"मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे गोपाल, सांवरिया मेरे गोपाल..."
राधा रानी ने जैसे ही कृष्ण का नाम सुना, वे दौड़ी चली आईं और प्रेम से मोर को गले लगा लिया।
उन्होंने पूछा, "मोर भैया, तुम कहां से आए हो?"
मोर बोला, "जय हो राधा रानी की! मैंने सुना था कि आप बहुत दयालु हैं और आज देख भी लिया। मैं एक वर्ष से श्री कृष्ण के द्वार पर भजन गा रहा था, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी।"
राधा रानी मुस्कुराई और बोली, "अरे मेरे कन्हैया ऐसे नहीं हैं! तुम एक बार फिर जाओ, लेकिन इस बार 'कृष्ण कृष्ण' नहीं बल्कि 'राधे राधे' कहना।"
श्री कृष्ण की स्वीकृति और मोर पंख का आशीर्वाद
राधा रानी की बात मानकर मोर गोकुल लौट आया और श्री कृष्ण के द्वार पर जाकर गाने लगा:
"श्री राधे राधे राधे, बरसाने वाली राधे..."
जैसे ही श्री कृष्ण ने राधा का नाम सुना, वे तुरंत दौड़ते हुए बाहर आए और प्रेम से मोर को गले लगा लिया।
कृष्ण बोले, "अरे मोर, तू कहां से आया है?"
मोर ने उत्तर दिया, "जब मैं एक वर्ष तक तुम्हारे नाम का भजन गा रहा था, तब तुमने मेरी ओर देखा भी नहीं। लेकिन जैसे ही मैंने राधा रानी का नाम लिया, तुम तुरंत दौड़ आए!"
भगवान श्री कृष्ण ने यह सुनकर गंभीरता से सोचा और कहा,
"अरे मोर, मैंने तुझे कभी पानी तक नहीं पिलाया। यह मेरा पाप है, लेकिन तूने आज राधा का नाम लिया है, यह तेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है।"
भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर मोर को वरदान दिया:
"जब तक यह सृष्टि रहेगी, तेरा पंख सदैव मेरे शीश पर विराजमान रहेगा। और जो भी भक्त मेरी राधा का नाम लेगा, वह सदा मेरे हृदय में रहेगा।"
उस दिन से भगवान श्री कृष्ण अपने मुकुट में मोर पंख धारण करने लगे।
सीख:
यह कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग भक्ति और प्रेम है। जो भी सच्चे मन से राधा रानी का नाम लेता है, उसे भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।
🙏 जय श्री कृष्ण! जय राधे रानी! 🙏
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